सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

होलिका दहन

श्री गणेशाय नमः 🙏🙏 

होलिका का चरित्र हमारे भारतीय पौराणिक कथाओं में विशेषकर विष्णु पुराण में उल्लेख प्राप्त होता है। बहुत ही महत्वपूर्ण माना गया है। 

होलिका को अक्सर उन्हें एक नकारात्मक पात्र के रूप में देखा गया है। या यूं कहें तो माना गया है। 

लोक कथाओं और क्षेत्रीय मान्यताओं  में उनके जीवन के कुछ ऐसे भी पहलू है जो प्रेम और विवशता को दर्शाता है। 

होलिका का संक्षिप्त जीवन परिचय के बारे में हम जानेंगे 

हम चलते है , उनके जीवन परिचय की ओर जानने की कोशिश करते है। उनके जीवन काल की कुछ महत्पूर्ण जानकारी को 

आप सभी को यह पता है। ही की वें राक्षस कुल की थी। उनके भाई दैत्य राज हिरण्यकश्यप  की बहन और भक्त प्रहलाद की बुआ थी। ये प्रायः सभी को पता है, होलिका महान ऋषि कश्यप की और दति की पुत्री थी। आपने यह भी सुना होगा की होलिका आग  से कभी भी नहीं जलेगी उन्हें वरदान था।

होलिका के पास एक ऐसा चादर था। की उसे ओढ़कर बैठ जायेगी आग में तो उसका कोई भी अंग जल नहीं पायेगी वह भस्म नहीं होगी आग से जल कर 

होलिका की प्रेम गाथा पर हम कुछ चर्चा करते है। होलिका का प्रेमी था। वह विशेषकर राजस्थान और  पंजाब के कुछ बीच में रहने वाला था। 

होलिका का प्रेमी का नाम राजकुमार इलोजी था। वह मड़वार ( वह वर्तमान में राजस्थान का रहने वाला था। 

होलिका और इलोजी का विवाह तय हो चुका था। 

जिस दिन होलिका प्रहलाद को लेकर अग्नि में बैठी उसी दिन फाल्गुन शुक्ल पक्ष पुर्णिमा तिथि थी । उसी दिन बरात होलिका के घर आने वाली थी। 

होलिका का आग में बैठने का कारण उनका भाई का प्रेम नही बल्कि भाई का आज्ञा था। साथ ही साथ परिवारिक निष्ठा भी थी। 

होलिका का भाई हिरणकश्यप अपने पुत्र प्रहलाद की हरि विष्णु के प्रति भक्ति से क्रोधित था । उसने प्रहलाद को मारने के लिए अनेकों योजनाएं बनाए पर असफल रहें मारने में 

उनके मस्तिष्क में विचार आया की क्यों ना बहन होलिका को अग्नि में प्रहलाद को लेकर बैठे यह सोच उन्होंने अपने बहन होलिका को आदेश दिए की वह प्रहलाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठ जाए , उनका भाई को पता था। की मेरी बहन आग में बैठेगी तो नही जलेगी उनके पास अनोखा चादर था। जो आग से उनकी बहन की सुरक्षा होगी यह सोचकर अपनी बहन को आदेश दिया 

बहन को विवशता थी। सो उन्होंने अपने भाई का आदेश का पालन किया भाई के दबाव के चलते ही आग में बैठने का विचार किया मैं तो सुरक्षित आग से बाहर आ जाऊंगी , फिर अपने प्रेमी इलोजी से शादी कर लुंगी 

दुखत अंत - होलिका जब प्रहलाद को लेकर बैठी तो भगवान की कृपा से निष्फल हो गया । क्योंकि उसका उपयोग अधर्म के लिए किया गया था। होलिका जल कर राख हो गयी और भक्त प्रहलाद अग्नि से सुरक्षित निकल गया । 

दिल को छू लेने वाली तत्थ 

जब इलोजी होलिका के घर बरात ले कर पहुंचे तो होलिका जल कर राख हो गयी पत्नी को राख के रूप में देखकर, इस दुख को सहन नहीं कर पाए और अपना पूरा जीवन वैराग्य बनकर बिताया 

आज भी जलौर ,राजस्थान जैसे क्षेत्रों में इलोजी की पूजा की जाती है। भव्य झाकी भी निकाली जाती है। 

अध्यात्मिक दृष्टि कोण से देखा जाए तो होलिका दहन केवल एक पौराणिक घटना नही बल्कि इसके गहरे अध्यात्मिक अर्थ है। जो हमारे भीतर चलने वाले द्वंद्व को दर्शाता है। 

अधर्म पर धर्म का विजय - 

इसका अर्थ यह है कि बुराई चाहे कितनी भी शक्ति शाली क्यो ना हो सत्य और धर्म के सामने हारना ही पड़ता है। 

होलिका के पास वरदान की शक्ति का अहंकार था। जबकि प्रहलाद के पास केवल भक्ति और विश्वास था। अंत में विश्वास की ही जीत शक्ति के दुरप्रयोग पर हुई । 

मन का विकारों का दहन 

अध्यात्मिक दृष्टि से होलिका हमारे भीतर की नकरात्मक प्रवत्तियों का प्रतिक है।

हिरण्यकश्यप को अपनी शक्ति का अहंकार था। ईष्र्या और द्षे जो होलिका को प्रहलाद के प्रति था। काम क्रोध ये जो तत्व है। जिन्हें हमें अग्नि में जलाकर भस्म कर देना चाहिए 

होलिका की कथा से हमें यह प्रेरणा मिलती है। कि यदि कोई शक्ति या वरदान मिलता है और आप उसका उपयोग किसी निर्दोष को नुकसान पहुंचाने के लिए करते है तो वह शक्ति स्वयं आपके ही विनाश का कारण बन जाती है। यदि आप प्रहलाद की तरह पूर्ण रूप से ईश्वर की भक्ति में  , सत्य के प्रति समर्पित हो जाते है , तो बाहरी परिस्थितयों आग रूपी बधाएं आपको विचलित नहीं कर सकती , यह इस बात का प्रतिक है , कि आत्मिक बल शारिरिक बल से कई गुणा बड़ा होता है।

यह त्यौहार आध्यात्मिक शुद्धि के तौर पर सर्दियों  के अतं एवं बसंत के आगमन का समय है। अग्नि के माध्यम से वातावरण को शुद्धि एवं होली के राख को तिलक के रूप में माथे में लगाने से शरीर की नाश्वरता को याद किया जाता है 

लड़की को पहले बार ससुराल में होली मनाना निषेध क्यों है। 

लोगों की मान्यता यह है कि जब इलोजी बरात ले कर होलिका के यहां पर पहुंचते है तो होलिका उन्हें राख के रूप में दिखाई दिया था। यही वजह है की वर के यहां पर वधू होली नही मनाती है। पर एक कारण यह भी है कहा जा सकता है लड़की अपने मायका में समाजिक मेल जोल बढ़ाने के लिए भी आती है। अर्थात् कुछ रस्में भी निभाई जाती है। जैसे की होली के दिन लड़की का चुमावन किया जाता है। नयी साड़ी दी जाती है। चौक डालकर पाटा में बिठाया जाता है। सभी रिश्तेदारों एवं समाज के लोगों  को अगल बगल पड़ोसियों को बुलाया जाता है। 

चुमावन किया जाता है। नेग दिया जाता है। ओली में पीली चावल , खड़ी हल्दी , खड़ी सुपारी सिन्दूर एवं सिक्का , गुझिया डाला जाता है। 

लड़का के यहा पर भी चुमावन किया जाता है। नया वस्त्र दिया जाता है। स्त्रियों के द्वारा बन्ना बन्नी की गीत गाया जाता है। 

यह हमारे समाज में नियम की जाती है। विभिन्न - विभिन्न प्रांतों में अलग अलग से नियम की जाती है। इसका उद्देश यह माना जाता है। की समाज एवं परिवार में मेल जोल बढ़ाना एवं इसी बहाना रिश्तेदारों का आना 


अब होलिका की पूजन समाग्री 

अपने अपने स्थान में सब अलग अलग विधि से पूजा करते है। 

लेकिन मैं यहां पर पूजन समाग्री लिख रही हूँ 

एक लोटा शुद्ध जल , रोरी , कुमकुम , गुलाल अक्षत जो खण्डति ना हो ,

कच्चा सूत होलिका में लपेटने के लिए या मौली धागा 

गोबर से बने छोटे छोटे टिकिया का माला वैसे फूलों की भी माला पहना है। धूप , दीप नैवैध , मूंग की दाल इस समय नया फसल आता है। चना एवं गेहू का उसे भी एक मुठ्टी , खड़ी हल्दी एक थोड़ी पीली सरसों  माचिस तेल या घी ,अगरबती नारियल ,

पंडितों अपने आचार्य को बुलवाकर विधि वत शुभ मुर्हुत में पूजा करवाए 

अन्त में सभी होलिका का परिक्रमा करें 

नोट हल्दी से सुख समृद्धि बढ़ती है। और सरसों से नकरात्मक प्रभाव समाप्त होता है। दूसरे दिन राख को घर में ला कर डाले घर पवित्र होता है। 

पहले चुलाह का जमाना था। तो होलिका की जलते हुए लकड़ी ला कर उसमें ही भोजन बनाया जाता था। पर अब सम्भव नही है। तो राख ला कर घर के कोने में छिड़क देवें चारों तरफ 

पहले सिर्फ पुरुष ही पूजा करते थे। अब शिक्षित होने के कारण ही सब पुरुष महिलाए एवं बच्चे एक साथ इकट्ठा हो कर श्रद्धा के साथ पूजा करते है। 

कुछ मात्राओं में गलती हो या कुछ नियम छूट गया हो तो क्षमा प्रार्थी हूँ 

आशा ठाकुर अम्लेश्वर पाटन रोड

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

मधुश्रावणी व्रत २०२३ - सागरिका महिला मंच

श्री महालक्ष्मी व्रत कथा🪷🪷 एक समय महर्षि द्पायन व्यास जी हस्तिनापुर आए उनका आगमन सुनकर राजरानी गांधारी सहित माता कुंती ने उनका स्वागत किया अर्द्ध पाद्य आगमन से सेवा कर व्यास जी के स्वस्थ चित् होने पर राजरानी गांधारी ने माता कुंती सहित हाथ जोड़कर व्यास जी से कहा, है महात्मा हमें कोई ऐसा उत्तम व्रत अथवा पूजन बताइए जिससे हमारी राजलक्ष्मी सदा स्थिर होकर सुख प्रदान करें, गांधारी जी की बात सुनकर व्यास जी ने कहा, हे देवी मैं आपको एक ऐसा उत्तम व्रत बतलाता हूं जिससे आपकी राजलक्ष्मी पुत्र पौत्र आदि सुख संपन्न रहेंगे। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को स्नान आदि से निवृत हो शुद्ध वस्त्र धारण कर महालक्ष्मी जी को ताजी दूर्वा से जल का तर्पण देकर प्रणाम करें, प्रतिदिन 16 दुर्वा की गांठ, और श्वेत पुष्प चढ़कर पूजन करें, १६धागों का एक गंडां बनाकर रखें पूजन के पश्चात प्रतिदिन एक गांठ लगानी चाहिए, आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को माटी के हाथी पर लक्ष्मी जी की मूर्ति स्थापित कर विधिवत पूजन करें ब्राह्मणों को दान दक्षिणा देकर संतुष्ट करें इस प्रकार पूजन करने से आपकी राजलक्ष्मी पुत्र पौत्र...

*सागरिका की पवित्र सरिता माँ महानदी पूजा अनुष्ठान विधा - संयोजिका श्रीमती आशा ठाकुर, श्रीमती भावना ठाकुर, श्रीमती सपना ठाकुर श्रीमती रक्षा झा एवं सखियां.श्री गणेशाय नमः आज दिनांक 30,8,25 अगस्त दिन शनिवार मैं संतान साते की पूजा विधि बताने जा रही हूँ यह व्रत भाद्रपद के शुक्ल पक्ष में संतान की दीघार्यु एव स्वस्थ होने की कामना करते हुए किया जाता है। जिनकी संतान नही होती वह भी यह व्रत नियम विधि के अनुसार करें तो अवश्य ही संतान की प्राप्ति होती है। प्रात : काल उठ कर स्नान करेंसारा घर का काम निपटा कर पूजा करने की जगह को साफ कर लेवें गंगा जल से शुद्धि करन करके जहा हमें पूजा करनी है। वहा पर सीता चौक डाले कलश के लिए फूल गौड़ा चौक रेहन अर्थात् चावल की आटा का घोल बनाए उससे चौक पूरे और चौक में सिन्दूर लगाए शंकर पार्वती उनके परिवार की स्थापना के लिए चौकी या पाटा रखें उसके ऊपर लाला या पीला कपड़ा बिछाए प्रतिमा या फोटों या फिर मिट्टी से शिव शंकर पार्वती एवं परिवार की मूर्ति बनाकर स्थापना करें पूजा की तैयारी : - परात में चंदन रोरी कुमकुम , फूल फुल माला , बेल पत्ती , दूबी अक्षत , काला तिल , जनेऊ , नारियल , शृंगार का समान वस्त्र कपूर , धूप, दीप आरती बैठने के लिए आसन गौरी गणेश कलश अमा का पत्ता लगा हुआ नैवेध फल नैवेध :- मीठा पूड़ी का भोग लगता है। उपवास : - संतान साते के दिन दिन भर उपवास रहते है। और पूजा करने के बाद मीठा पुड़ी ( पुआ ) खा कर व्रत तोड़ते है। इसके अलावा कुछ भी नही लेते जूस , चाय नीबू पानी पी सकते है। क्योंकि आज कल शुगर , बी पी की शिकायत रहती है। तो आप ले सकते है। अन्न नहीं लेते है। पूजा विधि शाम के समय गोधुली बेला में शिव पार्वती एवं उनकी परिवार की पूजा की जाती है। अच्छे से तैयार होकर सोलह शृंगार करके यह व्रत की जाती है। सर्व प्रथम गौरी गणेश कलश की पूजा उसके बाद गौर साठ की पूजा क्योंकि हम मैथिल ब्राम्हण है। तो हमारे यहा पर हर त्यौहार पर गौर साठ की पूजा की जाती है। उसी के बाद ही अन्य पूजा यह नियम महिलाओं के लिए ही है। गौर साठ पूजा के बाद शंकर पार्वती की पूजा जल से स्नान दूबी या फूल लेकर करें , फिर चंदन , रोरी कुमकुम लगाए पुष्प चढ़ाए , माला पहनाए संतान साते में सात गठान की मौली धागा से चूड़ा बनाए या जो सामर्थ है। वह सोने की कंगन या चांदी का कंगन बनाए एवं दूबी सात गाठ करके चढ़ाए कंगन की पूजा करें भोग मीठा पुड़ी लगाए जितना संतान रहता है। उनके नाम से सात पुआ गौरी शंकर एवं सात पुआ संतान के नाम से एक भाग ब्राम्हण को दान करें एवं परिवार को बांटे एक भाग जो सात पुआ है। उसे स्वय ग्रहण करें कंगन पहन कर ही प्रसाद को ग्रहण करें आरती : - पहले गणेश जी का करें फिर शंकर जी का दक्षिणा सामर्थ अनुसार संकल्प करें आशा ठाकुर अम्लेश्वर 🙏🙏.. श्री गणेशाय नमः ,,श्री गणेशाय नमः सधौरी की विधि यह विधि नौवा महीने में किया जाता है। पंडित जी से शुभ मुर्हुत पूछकर किया जाता है। सबसे पहले सिर में बेसन डालने का विधि होता है। पांच या नौ सुहागन के द्वारा सिर पर बेसन डाला जाता है। और चूकिया से जल सिर के ऊपर डाला जाता है। उसके लिए नव चूकिया चाहिए होता है। बेसन मुहूर्त के हिसाब से ही डाला जाता है। इसमें विलम्ब नहीं करना चाहिए नहाने से पहले आंचल में हलदी + सुपारी + चांवल + सिक्का डालना चाहिए चावल का घोल से हाथ देते हुए उसमें सिन्दूर , पुषप दुबी डालें प्रत्येक हाथा में वघू या कन्या के द्वारा जहा पर बेसन डाला जायेगा वहां पर फूल गौड़ा चौक डाले चौकी या पाटा रखें फिर बेसन डालें और जल भी सिर के ऊपर डालें कम से कम पांच या सात बार सभी सुहागनियों के द्वारा उसके उपरान्त स्नान अच्छी तरह करने दो गिला कपड़ा पहने रहें किसी छोटी बच्ची या बच्चा जो सुन्दर हो चंचल हो उसके हाथ से शंख में कच्चा दूध और पुष्प डाल कर भेजे बालक और बालिका को अच्छी तरह से देख र्ले उनसे शंख और दूध लेकर भगवान सूर्य नारायण को अर्ध्य देवें इधर उधर किसी भी को ना देखें सूर्य नारायण को प्रणाम करें पूजा रूम में प्रवेश करें बाल मुंकुद को प्रणाम करें कपड़ा नया वस्त्र धारण करें शृंगार करें आलता लगाए पति पत्नी दोनों गंठ बंधन करके पूजा की जगह पर बैठ जायें पूजा जैसे हम करतेप्रकार करे आरती करें भोग लगाए तन्त् पश्चात् जो परात में आम का पत्ता के ऊपर दिया रखें दिया में चावल के घोल से . + बनाये सिन्दूर लगाए हल्दी सुपाड़ी सिक्का चुड़ी दो रखें प्रत्येक दिये में सिन्दूर की पुड़िया रखें गुझिया रखें उसे भोग लगा कर पूजा के बाद प्रत्येक सुहागिनों को आंचल से करके उनके आचल में दें । फिर पूजा स्थल पर कुश बढ़ाओं चौक डाले पाटा रखें उसके ऊपर गाय + बैल + कहुआ को गोत्र के अनुसार रखें बैले हो तो घोती आढ़ऐ गाय हो तो साड़ी पूजा के बाद कांसे के थाली में बनी हुई समाग्री को पांच कौर शहद डाल कर सास या मां के द्वारा पांच कौर खिलाए उसके पहले ओली में पांच प्रकार का खाद्य समाग्री डाले जैसे गुझिया अनारस फल मेवा डालें और छोटे बच्चे के हाथ से निकलवाए हास्य होता है। थोड़ी देर के लिए गुझिया निकला तो लड़का प प्ची निकला तो लड़की फिर सभी सुहागिनी यों को भोजन करवाए आशा ठाकुर अम्लेश्वर 🙏🙏ज्युतिया ,,यह त्यौहार क्वांर महीने में कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथी को अपने बच्चे की दीर्घायु , तेजस्वी , और स्वस्थ होने की कामना करते हुए माताएं इस दिन निर्जला व्रत करती है।विधि ज्युतिया के पहले दिन किचन शाम को साफ सुथरा कर पितरों के लिए भोजन बनाया जाता है। शाम को तरोई या कुम्हड़ा के पत्ते पर पितराईन को दिया जाता है। उसके पहले चिल , सियारिन , जुट वाहन , कपूर बती , सुहाग बती , पाखर का झाड़ , को सभी चींजे खाने का बना हुआ रहता है। फल मिठाई दूध , दही , घी शक्कर मिला कर (मिक्स ) करके ओडगन दिया जाता है। तत् पश्चात जो इस दुनिया में नही है। उन पितराईन के नाम लेकर उस पत्ते पर रख कर उन्हें दिया जाता है। नाम लेकर *दूसरे दिन*सुबह स्नान कर प्रसाद बनाए अठवाई , बिना नमक का बड़ा शाम के समय पूजा करें *पूजा की तैयारी* चंदन , रोरी कुमकुम गुलाल , फूल , दूबी , अक्षत , तिल , कपूर आरती , घूप दीप भीगा मटर , खीरा या फिर केला ज्युतिया लपेटने के लिए गौर साठ का डिब्बा गौरी गणेश कलश चौक पूरे , गौरी गणेश कलश और ज्यूत वाहन पूजा के लिए पाटा रखें उसके उपर रेहन से पोता हुआ ग्लास उसमें भीगा हुआ मटर डाले खीरा या ककड़ी जो उपलब्ध हो उसमें आठ गठान आठ जगह पर बनी हुई ज्यूतीया लपेटे पूजा करें विधि वत हर पूजा करते है। ठीक उसी तरह आरती करें प्रसाद भोग लगाए *तीसरे दिन* सुबह स्नान कर भोजन बनाएं पिताराईन को जो चढ़ा हुआ प्रसाद रहता है। और ग्लास का मटर पहले पितराईन को ओडगन देवें पत्ते में रखकर और भोजन साथ साथ में देवें एक ज्यतिया दान करें ब्रम्हण के यहां सीधा , दक्षिणा रखकर दूसरा स्वयं पहने आस पास ब्राम्हण ना हो तो आप मंदिर में दान कर सकते है। *पूजा के पूर्व संकल्प करें*मासे मासे क्वांर मासे कृष्ण पक्षे अष्टमी तिथि मम अपना नाम एवं गौत्र कहे और यह कहे सौभाग्यादि , समृद्धि हेतवे जीवीत पुत्रिका व्रतोपवासं तत्तपूजाच यथा विधि करिश्ये । कहकर फूल चढ़ाए प्रार्थना कर पूजा आरम्भ करें पूजा विधि सभी राज्यों में अपने अपने क्षेत्रों के अनुसार करें जिनके यहां जैसा चलता है परम्परा अपने कुल के नियम के अनुसार करें यूपी में बिहार में शाम को नदी , सरोव एवं तलाबों बावली के जगह पर जा कर वही चिडचीड़ा दातून से ब्रश कर वही स्नानकर वही पूजा करते है। सभी महिला एक साथ मिलकर करती है। उन्ही में से एक महिला कथा सुनाती है। वहां पर जीउतिया उनका सोना या चांदी का बना लहसुन आकृति का रहता है। हर साल जीउतिया सोनार के यहा जा कर बढ़ाते है। उसी जीउतिया को हाथ में रख कथा कहती है। और हर महिला के बच्चों का नाम लेकर आर्शीवाद देती है। ये उनका अपना रिति है। परन्तु हमारे छत्तीसगढ़ में और हम अपने घर पर जिस तरह पूजा पाठ करते हुए देखा है। उसे ही हम आप सबके बीच प्रस्तुत किया है। त्रुटि हो तो क्षमा प्रार्थी आपका अपना आशा ठाकुर अम्लेश्वर पाटन रोड छत्तीसगढ़ रायपुर 🙏🙏श्री गणेशाय नमः सधौरी की तैयारी गौरी गणेश + कलश चंदन रोरी कुमकुम घूप दीप कपूर अगरबत्ती नारियल भोग गौर साठ का डिब्बा रेहन चावल का पीसा हुआ हाथा देने के लिए एवं थाली कांसे की थाली मेवा काजू किशमिश बादाम छुहारा आदि ड्राई फूड मौसम अनुसार फल 60,आम का पत्ता मिट्टी का दिया 60 , चुड़ी सिन्दूर खड़ी हल्दी , खड़ी सुपारी 60 हल्दी 60 सुपारी जनेऊ बेसन शंख पाटा , पान का बिड़ा शहद नया वस्त्र पहने के लिए गोत्र के अनुसा मिट्टी का बैल , गाय , कछुआ जैसा हो गोत्र उसके अनुसार बनाना ओली में डालने के लिए पिली चांवल हल्दी सुपारी रुपया या सिक्का सुहागिनों को भी ओली डालने के लिए 60 गुझिया , अनरसा , दहरोरी मिठाई खोये का बना हुआ पूजा के लिए पाटा या चौकी , बैठने के लिए पाटा गठबंधन के लिए घोती गठबंधन करने के लिए थोड़ी सी पीली चांवल एक हल्दी एक सुपारी एक रुपय का सिक्का फूल दूबी डालना और गठबधन करना है। दूबी फूल फूल माला दूबी गौरी गणोश को चढ़ाने के लिए अर्थात् गणेश जी को चढ़ाने के लिए दमाद ,या बेटा के पहने के लिए जनेऊ बहू या बेटी के लिए सोलह शृंगार गजरा आदि कांसे की थाली में भोजन फल , मेवा शहद रखने के लिए

अनंत चतुर्दशी की कथा  हाथ में फूल , अक्षत एवं जल ले कर कथा सुने  प्राचीन काल में सुमंत नामक एक ब्राम्हण था। जिसकी पुत्री सुशीला थी। सुशीला का विवाह कौडिन्य ऋषि से हुआ ।  जब सुशीला की बिदाई हुई तो उसकी विमाता कर्कशा ने कौडिन्य ऋषि को ईट पत्थर दिया रास्ते में जाते समय नदी पड़ा वहा पर रुक कर कौडिन्य ऋषि स्नान कर संध्या कर रहे थे। तब सुशीला ने उन्हें अनंत  चतुर्दशी की महिमा का महत्व बताया और 14, गांठ वाली  धागा उनके हाथ पर बांध दी जिसे सुशीला ने नदी किनारे प्राप्त की थी।  कौडिन्य ऋषि को लगा की उनकी पत्नी सुशीला उनके ऊपर जादू टोना हा कर दी है। वह उस धागे को तुरन्त निकाल कर अग्नि में जला दिया जिससे अनंत भगवान का अपमान हुआ । और क्रोध में आकर कौडिन्य ऋषि का सारा सुख समृद्धि , संपत्ति नष्ट कर दिए   कौडिन्य ऋषि का मन विचलित हो गया परेशान हो गए और आचनक राज पाठ जाने का कारण अपने पत्नी से पूछा तब उनकी पत्नी उन्हें सारी बातें बतायी यह सुनकर कौडिन्य ऋषि पश्चाताप करने लगा और घने वन की ओर चल दिए । वन में भटकते भटकते उन्हें थकान एवं कमजोरी होने लगा और मूछित होकर जम...

आपसी संवाद - सागरिका महिला मंच

काफी लम्बे समय बाद हमारी संस्कृति पर चर्चा हो रही है  प्रश्न? पितृ पक्ष और महालया लक्ष्मी पूजन का अर्थ? दोनों साथ क्यों? एक तरफ पितृ तर्पण और एक  महालक्ष्मी पर्व? लक्ष्मी पूजन भी गज वाहिनी लक्ष्मी महालक्ष्मी  क्यों नही होगी? वर्ष में दीपावली,कोजागरी को भी लक्ष्मी पूजा होती है।परंतु महालक्ष्मी पूजा सिर्फ पितृ पक्ष  में श्राद्ध और पूजन साथ करते हैं? इसका रहस्य खोजते हैं? आप अपने विचार प्रकट कर सकते हैं। श्रीमती आशा ठाकुर का उत्तर - पितृ पक्ष और महालक्ष्मी पूजन का अर्थ और महत्व कुछ इस तरह है।  जैसे की पृत पक्ष एक पारंपरिक हिन्दूओं के श्रद्धा से जुड़ी ( पूर्वजों ) की आत्मा की शांति और तृप्ति के लिए किया जाता है।  इस दौरान , लोग अपने पितरों की आत्मा शांति के लिए तर्पण , श्राद्ध करते है।  पितृ पक्ष का उद्देश्य होता है। अपने पितरों की आत्मा को तृप्ति करना और मोक्ष की प्राप्ति दिलाने में मददत करना होता है।  महालक्ष्मी पूजन : -  महालक्ष्मी पूजन देवी की आराधना के लिए की जाती है। इस पूजन का यह अर्थ है। की महालक्ष्मी पूजन से सुख , समृद्धि , धन की प्...