श्री गणेशाय नमः 🙏🙏
होलिका का चरित्र हमारे भारतीय पौराणिक कथाओं में विशेषकर विष्णु पुराण में उल्लेख प्राप्त होता है। बहुत ही महत्वपूर्ण माना गया है।
होलिका को अक्सर उन्हें एक नकारात्मक पात्र के रूप में देखा गया है। या यूं कहें तो माना गया है।
लोक कथाओं और क्षेत्रीय मान्यताओं में उनके जीवन के कुछ ऐसे भी पहलू है जो प्रेम और विवशता को दर्शाता है।
होलिका का संक्षिप्त जीवन परिचय के बारे में हम जानेंगे
हम चलते है , उनके जीवन परिचय की ओर जानने की कोशिश करते है। उनके जीवन काल की कुछ महत्पूर्ण जानकारी को
आप सभी को यह पता है। ही की वें राक्षस कुल की थी। उनके भाई दैत्य राज हिरण्यकश्यप की बहन और भक्त प्रहलाद की बुआ थी। ये प्रायः सभी को पता है, होलिका महान ऋषि कश्यप की और दति की पुत्री थी। आपने यह भी सुना होगा की होलिका आग से कभी भी नहीं जलेगी उन्हें वरदान था।
होलिका के पास एक ऐसा चादर था। की उसे ओढ़कर बैठ जायेगी आग में तो उसका कोई भी अंग जल नहीं पायेगी वह भस्म नहीं होगी आग से जल कर
होलिका की प्रेम गाथा पर हम कुछ चर्चा करते है। होलिका का प्रेमी था। वह विशेषकर राजस्थान और पंजाब के कुछ बीच में रहने वाला था।
होलिका का प्रेमी का नाम राजकुमार इलोजी था। वह मड़वार ( वह वर्तमान में राजस्थान का रहने वाला था।
होलिका और इलोजी का विवाह तय हो चुका था।
जिस दिन होलिका प्रहलाद को लेकर अग्नि में बैठी उसी दिन फाल्गुन शुक्ल पक्ष पुर्णिमा तिथि थी । उसी दिन बरात होलिका के घर आने वाली थी।
होलिका का आग में बैठने का कारण उनका भाई का प्रेम नही बल्कि भाई का आज्ञा था। साथ ही साथ परिवारिक निष्ठा भी थी।
होलिका का भाई हिरणकश्यप अपने पुत्र प्रहलाद की हरि विष्णु के प्रति भक्ति से क्रोधित था । उसने प्रहलाद को मारने के लिए अनेकों योजनाएं बनाए पर असफल रहें मारने में
उनके मस्तिष्क में विचार आया की क्यों ना बहन होलिका को अग्नि में प्रहलाद को लेकर बैठे यह सोच उन्होंने अपने बहन होलिका को आदेश दिए की वह प्रहलाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठ जाए , उनका भाई को पता था। की मेरी बहन आग में बैठेगी तो नही जलेगी उनके पास अनोखा चादर था। जो आग से उनकी बहन की सुरक्षा होगी यह सोचकर अपनी बहन को आदेश दिया
बहन को विवशता थी। सो उन्होंने अपने भाई का आदेश का पालन किया भाई के दबाव के चलते ही आग में बैठने का विचार किया मैं तो सुरक्षित आग से बाहर आ जाऊंगी , फिर अपने प्रेमी इलोजी से शादी कर लुंगी
दुखत अंत - होलिका जब प्रहलाद को लेकर बैठी तो भगवान की कृपा से निष्फल हो गया । क्योंकि उसका उपयोग अधर्म के लिए किया गया था। होलिका जल कर राख हो गयी और भक्त प्रहलाद अग्नि से सुरक्षित निकल गया ।
दिल को छू लेने वाली तत्थ
जब इलोजी होलिका के घर बरात ले कर पहुंचे तो होलिका जल कर राख हो गयी पत्नी को राख के रूप में देखकर, इस दुख को सहन नहीं कर पाए और अपना पूरा जीवन वैराग्य बनकर बिताया
आज भी जलौर ,राजस्थान जैसे क्षेत्रों में इलोजी की पूजा की जाती है। भव्य झाकी भी निकाली जाती है।
अध्यात्मिक दृष्टि कोण से देखा जाए तो होलिका दहन केवल एक पौराणिक घटना नही बल्कि इसके गहरे अध्यात्मिक अर्थ है। जो हमारे भीतर चलने वाले द्वंद्व को दर्शाता है।
अधर्म पर धर्म का विजय -
इसका अर्थ यह है कि बुराई चाहे कितनी भी शक्ति शाली क्यो ना हो सत्य और धर्म के सामने हारना ही पड़ता है।
होलिका के पास वरदान की शक्ति का अहंकार था। जबकि प्रहलाद के पास केवल भक्ति और विश्वास था। अंत में विश्वास की ही जीत शक्ति के दुरप्रयोग पर हुई ।
मन का विकारों का दहन
अध्यात्मिक दृष्टि से होलिका हमारे भीतर की नकरात्मक प्रवत्तियों का प्रतिक है।
हिरण्यकश्यप को अपनी शक्ति का अहंकार था। ईष्र्या और द्षे जो होलिका को प्रहलाद के प्रति था। काम क्रोध ये जो तत्व है। जिन्हें हमें अग्नि में जलाकर भस्म कर देना चाहिए
होलिका की कथा से हमें यह प्रेरणा मिलती है। कि यदि कोई शक्ति या वरदान मिलता है और आप उसका उपयोग किसी निर्दोष को नुकसान पहुंचाने के लिए करते है तो वह शक्ति स्वयं आपके ही विनाश का कारण बन जाती है। यदि आप प्रहलाद की तरह पूर्ण रूप से ईश्वर की भक्ति में , सत्य के प्रति समर्पित हो जाते है , तो बाहरी परिस्थितयों आग रूपी बधाएं आपको विचलित नहीं कर सकती , यह इस बात का प्रतिक है , कि आत्मिक बल शारिरिक बल से कई गुणा बड़ा होता है।
यह त्यौहार आध्यात्मिक शुद्धि के तौर पर सर्दियों के अतं एवं बसंत के आगमन का समय है। अग्नि के माध्यम से वातावरण को शुद्धि एवं होली के राख को तिलक के रूप में माथे में लगाने से शरीर की नाश्वरता को याद किया जाता है
लड़की को पहले बार ससुराल में होली मनाना निषेध क्यों है।
लोगों की मान्यता यह है कि जब इलोजी बरात ले कर होलिका के यहां पर पहुंचते है तो होलिका उन्हें राख के रूप में दिखाई दिया था। यही वजह है की वर के यहां पर वधू होली नही मनाती है। पर एक कारण यह भी है कहा जा सकता है लड़की अपने मायका में समाजिक मेल जोल बढ़ाने के लिए भी आती है। अर्थात् कुछ रस्में भी निभाई जाती है। जैसे की होली के दिन लड़की का चुमावन किया जाता है। नयी साड़ी दी जाती है। चौक डालकर पाटा में बिठाया जाता है। सभी रिश्तेदारों एवं समाज के लोगों को अगल बगल पड़ोसियों को बुलाया जाता है।
चुमावन किया जाता है। नेग दिया जाता है। ओली में पीली चावल , खड़ी हल्दी , खड़ी सुपारी सिन्दूर एवं सिक्का , गुझिया डाला जाता है।
लड़का के यहा पर भी चुमावन किया जाता है। नया वस्त्र दिया जाता है। स्त्रियों के द्वारा बन्ना बन्नी की गीत गाया जाता है।
यह हमारे समाज में नियम की जाती है। विभिन्न - विभिन्न प्रांतों में अलग अलग से नियम की जाती है। इसका उद्देश यह माना जाता है। की समाज एवं परिवार में मेल जोल बढ़ाना एवं इसी बहाना रिश्तेदारों का आना
अब होलिका की पूजन समाग्री
अपने अपने स्थान में सब अलग अलग विधि से पूजा करते है।
लेकिन मैं यहां पर पूजन समाग्री लिख रही हूँ
एक लोटा शुद्ध जल , रोरी , कुमकुम , गुलाल अक्षत जो खण्डति ना हो ,
कच्चा सूत होलिका में लपेटने के लिए या मौली धागा
गोबर से बने छोटे छोटे टिकिया का माला वैसे फूलों की भी माला पहना है। धूप , दीप नैवैध , मूंग की दाल इस समय नया फसल आता है। चना एवं गेहू का उसे भी एक मुठ्टी , खड़ी हल्दी एक थोड़ी पीली सरसों माचिस तेल या घी ,अगरबती नारियल ,
पंडितों अपने आचार्य को बुलवाकर विधि वत शुभ मुर्हुत में पूजा करवाए
अन्त में सभी होलिका का परिक्रमा करें
नोट हल्दी से सुख समृद्धि बढ़ती है। और सरसों से नकरात्मक प्रभाव समाप्त होता है। दूसरे दिन राख को घर में ला कर डाले घर पवित्र होता है।
पहले चुलाह का जमाना था। तो होलिका की जलते हुए लकड़ी ला कर उसमें ही भोजन बनाया जाता था। पर अब सम्भव नही है। तो राख ला कर घर के कोने में छिड़क देवें चारों तरफ
पहले सिर्फ पुरुष ही पूजा करते थे। अब शिक्षित होने के कारण ही सब पुरुष महिलाए एवं बच्चे एक साथ इकट्ठा हो कर श्रद्धा के साथ पूजा करते है।
कुछ मात्राओं में गलती हो या कुछ नियम छूट गया हो तो क्षमा प्रार्थी हूँ
आशा ठाकुर अम्लेश्वर पाटन रोड
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