*सत्यवान -सावित्री*
आप सभी को वट सावित्री व्रत की शुभकामनाएं🙏
आज सभी ने सत्यवान सावित्री की कहानी कही सुनी,सागरिका पटल पर भी कहानी आशा भाभी द्वारा प्रस्तुत की गई।
अब एक प्रश्न की सावित्री ने 3 वर ही क्यों माँगे?इन का रहस्य क्या हो सकता है?
साथ ही वट सावित्री की कथा का रहस्य??
आप सभी विचार कीजिये🙏🙏
श्रीमती वंदना ठाकुर
सादर प्रणाम मेरा व्यक्तिगत विचार है औरत चाहे सावित्री हो या अन्य कोई सत्य युग या कलयुग की जीवन भर सिर्फ तीन वरदान ही मांगती है मेरा मायके भरापूरा रहे । मेरे पतिदेव दीर्घायु रहे। मेरे घर परिवार बच्चे सुखी रहे। सिर्फ अपने लिये कुछ मांगना भूल जाती है तीजा हो खमरछठ सिर्फ परिवार की सलामती ।धन्य धन्य है महिलाओ का जिगर
श्रीमती सलीला ठाकुर 🙏
श्रीमती कल्पना झा
*सावित्री के द्वारा पति के प्राण के बदले यम राज के 3 वर का रहस्य*
ज्योतिष शास्त्र और अध्यात्म ही भारतीय संस्कृति का आधार है ।
यही जीवन जीने की कला , जीवन दर्शन , दूरदृष्टि , भवसागर के दर्शन के चक्षु भी ।
इसको ऋषिसत्ता ने दैनन्दिनी जीवन मे समाहित संस्कृति की विरासत की अमूल्य निधि प्रदान की ।
हम देखते है की भारतीय नारी हर पर्व त्यौहार व्रत को पूजन ,भजन , सुस्वादु व्यंजन का भोग एवम कथा द्वारा उत्साहपूर्ण मनाती है ।
जैसा ब्रह्मांड वैसा ही पिंड पर प्रभाव होगा।
आश्चर्यजनक रूप से इसके रहस्य को ज्योतिष शास्त्र ही प्रकट करता है ।
वट सावित्री व्रत की कथा में 3 वर सावित्री के सतीत्व ,साधना के फ़लस्वरू यम याने काल( राहु) द्वारा दिये गए-
1 सास श्वसुर की आँखों की ज्योति
2 खोया राज -पाठ
3 पुत्र प्राप्ति का वरदान
इनका आशय रहस्य ज्योतिष शास्त्र में है ।
यह स्थिति हर वर्ष वट सावित्री ज्येष्ठ अमावश्या को होगी ।
प्रकृति नारी शक्ति की साधना से इस दुरह काल की साधना ,पुण्य वरदायी होगी।
वट ,वरगद के छाँव में कई गयी साधना अक्षय वरदानकारी होगी क्योंकि सूर्य चन्द्र की कोणात्मक ,राष्यादि ,अंशात्मक स्थिति युति इस प्रकार ऊर्जा को प्रवाहित करती है ।
1 आँख क्यों क्योंकि सूर्य ,चन्द्र कुंडली में आँख के प्रतिनिधि है ,भाव 2 मारक भाव काल पुरुष की आँख का है अतः यहाँ सूर्य चन्द्र एक साथ है तो चन्द्र रोशनी विहीन होगा ।
2 दूसरा वर राज्य पाठ
क्योंकि सूर्य राजा ग्रह ,शासन ,राज्य ,सफलता ,यश ,मान सम्मान ,पद ,स्वास्थ्य ,औषधि का कारक अपनी शत्रु राशि में स्थिति रहता है ,जो पति के पिता याने भाव 3 से व्यय भाव 2 में रहते है तो सावित्री ने पति के पिता का राज -पाठ मांगा।
3 अब वर 3 पुत्रवान क्यों? क्योंकि काल वैश्विक कुंडली में भाव 5 संतान भाव है उसका स्वामी सूर्य होगा ,सूर्य स्वयं के पिता और पुत्र कारक है जीन्स के संवाहक ऊर्जा के स्रोत वह क्रूर होकर चरम दाहक स्थिति में चन्द्र कि ज्योत्सना को लील लेते है ।अतः काल से सावित्री नारी शक्ति पुत्र वान हो का वरप्राप्त करती है।
*वट सावित्री व्रत कथा का रहस्य*
मुझको हमेशा कार्य के पीछे का कारण जानने की लालसा रही ।
क्यों ?कैसे? कब?
जब ज्योतिष के सागर में गोता लगाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ तो बहुत से रहस्यों का अनावरण स्वतः मानस पटल पर होने लगा ।
बहुत ही सुखद आश्चर्य और गर्व होता है उन महान ऋषियों की तप साधना से अनावृत हुई सांस्कृतिक निधि पर ।। उन्होंने अन्तर्चेतन जगत से आप्त ज्ञान को मेधा शक्ति से जनकल्याणकारी ,लोकोपयोगी स्वरूप प्रदान किया ।
ग्रह नक्षत्रों के गोचर और ब्रह्मांडीय ऊर्जा के अनुसार जीवन जीने की कला का मार्गदर्शन किया ।
कितने सरल ,सहज ,उत्साह उमंग ,सहयोग ,सहकार ,प्रकृति संरक्षण ,अनुकूलन को
साधना तप की सनातन संस्कृति की विरासत प्रदान की ।
सारगर्भित स्वरूप से
हमारे व्रत पर्व की कहानी व किवदंतियां उन्हीं ऊर्जा की गाथा कहती है ।
हम देखते है कि वर्ष भर चैत्र मास नव संवत्सर से हम हर माह में सूर्य ,चन्द्र की स्थिति अनुसार प्रत्येक दिन ही कोई न कोई पर्वोत्सव का आयोजन करते है।
हर माह की अमावश्या ,पूर्णिमा को बड़े त्यौहार होते हैं। हर व्रत की कोई न कोई विशेष कहानी है ।
इसका भी रहस्य है ।
*आगे प्रस्तुत करेंगे समसामयिक वट सावित्री व्रत की कहानी का रहस्य* -
हमारा इतिहास,
संस्कृति लोक कथाओं,किंदन्तियाँ,कहानियों आदि में पीढ़ीदर हस्तांतरित हो रहा।
यह मात्र कथा नहीं है!!
इनकी गहराई,रहस्य,प्रयोजन को जानने का प्रयास करो बहुत ही रोचक और सार्थक उद्देश्य प्रकट होता है।
हमारे ऋषियों ने हमको प्रकृति की ऊर्जा को प्राप्तकरने की कला इन कहानियों में है।
कहानी हमारी मातृ शक्तियों से सुनी है जब ब्राह्मण ब्राह्मणी 6 पुत्रों को नाग (याने राहु काल प्रारब्धवश) डस लेता है उनकी मृत्यु के बाद तब बहुत ही मजबूरी में 7वें पुत्र का विवाह ऋषि कन्या से होता है । बारात जब विश्राम के लिए रुकती है वहाँ 7 वट वृक्ष की छांह होती है ।
6 भाइयों की मृत्यु के बाद नव वधु जिसका सबसे छोटे पुत्र से विवाह हुआ है। बेटी के अनुग्रह परउसके साथ माँ तैयारी जोड़ कर रखती है की वह वट वृक्ष की पूजा कर सके ।
उस समय नागिन द्वारा को डस लिया जाता है ,यमराज लेने आते है तो उडद फेंकती है , तब स्वयं भगवान प्रकट होते है उनको मोंगरा का फूल अर्पित करती है ।
वह वर सौभाग्य वती होने का वर देकर कर्मानुबंधन से मुक्ति प्रदान करते है ।
7 पेड़ 7 ग्रह ,7 चक्र ,7 भुवन 7 लोक
7सप्तपदी
7इंद्रधनुष के रंग ,
7सप्तऋषि
(हम उनकी ही संतान हैं)
हाथों के 7 प्रकार
यह पहले वर्ष नव विवाहिता से 7वृक्ष का पूजन कराया जाता है ।
एक वृक्ष की 7 बार पूजा भी कर सकते हैं।
*ज्योतिष रहस्य*
इस एक मात्र अमावस्या को चन्द्र उच्चस्थ होकर वृष राशि स्वामी शुक्र रोहिणी नक्षत्र स्वामीचन्द्र में स्थित होते हैं।
साथ ही सूर्य भी साथ होंगे।
शुक्र काल चक्र कुंडली में भाव 2 और 7 मारक भाव का स्वामी होता है।
साथ ही सप्तम पति/पत्नी जीवन साथी भाव से दूसरा भाव अष्टम संकट मृत्यु भाव भी है।
शुक्र सौंदर्य,संजीवनी कारक है।
शुक्र लक्ष्मी कारक लौकिक जगत का स्वामी है इसलिये लक्ष्मी के साथ विष्णु भगवान की पूजा का विधान है।
अब कथा में सावित्री के पति के पूर्वज 6 भाई की
जो मृत हो चुकें हैं उनको जीवन दान संजीवनी विद्या से ही प्राप्त होगा।
संजीवनी शक्ति असुर गुरु शुक्राचार्य के पास है।
ज्येष्ठ मास में सूर्य रोहिणी तथा चन्द्र गुरु ज्येष्ठा नक्षत्र में हो तो वह महा ज्येष्ठी कही जाती है।
(यह कमलाकर भट्ट रचित
' निर्णय सिंधु ' का मत है)
वट सावित्री ज्येष्ठ मास अमावश्या तथा महाराष्ट्र आदि में पूर्णिमा को होती है ।
अमावस्या का दिन है तो चन्द्र सूर्य साथ में 0°अंश में होंगे पूर्णिमा को आमने -सामने ,समसप्तक 180°अंश की दूरी पर।
यह दोनों स्थान काल चक्र में मारक स्थान हैं।
पितृ ऋण से उऋण होने पितृ श्राद्ध किया जाता है, इसमें उडद दाल को शनि ,राहु की शांति के लिए उपयोग किया जाता है।
शुक्र का सम्बन्ध सुगन्ध,सौंदर्य से है ,साथ ही सफेद रंग पर भी शुक्र का अधिकार है।अतः मोंगरे के फूल विष्णु लक्ष्मी को चढ़ाये जाते
हैं।
कहानी में छाते का भी उल्लेख किया जाता है जिसको हम श्राद्ध में दान करते हैं ,इसका सम्बन्ध राहु से है।
अतः वट सावित्री व्रत
ज्येष्ठ मास में पति की दीर्घायु,कुलोन्नती, पितृ ऋण से उऋण होने एवम
प्रारब्ध जन्य दोषों के शमन के लिए नारी शक्ति
इस सौभाग्य मंगलकारी कामना पूर्ति , साधना के लिए वट /बरगद,वट की पूजा,आराधना परिक्रमा करती है।
वट में त्रिदेवों की शक्ति है।
श्रीकृष्ण, विष्णु का निवास भी है।
यह दीर्घ जीवी तथा बहु शाखा जड़ वाला वृक्ष है।
पीपल की आयु 200 से 300 वर्ष होती है।
किन्तु वरगद की उम्र 200 से 5000 साल तक हो सकती है।
अतः इसी प्रकार वंश वृद्धि हो तथा वट की तरह मजबूत शक्ति शाली हो ।
ऑक्सीजन अर्थात प्राणशक्ति का उत्सर्जन भी बड़ वृक्ष में प्रचुर मात्रा में होता है।
वृक्षों में जीवनी शक्ति अमावश्या में जड़ में तथा पूर्णिमा में शीर्ष पर होगी।
यह बहुत सी जड़ वाला वृक्ष ज्येष्ठी अमावस्या को सूर्य की प्रचण्ड तपन चरम पर होती है।
अतः वट वृक्ष शीतल है अतः शरीर को प्राकृतिक शीतलता प्राप्त करने का ज्येष्ठ मास की अमावस्या पूर्णिमा सबसे उपयुक्त समय होगा।
अद्भुत !!भारतीय संस्कृति की अनुपम व्रत,पर्वों अनुष्ठान,त्यौहारों की धरोहर है जो प्रकृति के साथ संतुलन के साथ जीवन जीने की कला है !!
भारतीय संस्कृति जीवन को सरल सहज बना कर आनंद के साथ परमानंद को समर्पित करने का मार्ग है।
इसका रहस्य वेद नेत्र/चक्षु ज्योतिष शास्त्र से प्रकट होता है।
सर्वे भवन्तु सुखिनः
यही सार्वभौमिक सत्य है।
अखंड सौभाग्य दायी
वट सावित्री की हार्दिक शुभकामनाएं
कल्पना झा
अध्यक्ष
प्राच्य विद्या शोध मण्डल
काफी लम्बे समय बाद हमारी संस्कृति पर चर्चा हो रही है
प्रश्न?
पितृ पक्ष और महालया लक्ष्मी पूजन का अर्थ? दोनों साथ क्यों?
एक तरफ पितृ तर्पण और एक महालक्ष्मी पर्व?
लक्ष्मी पूजन भी गज वाहिनी लक्ष्मी महालक्ष्मी क्यों नही होगी? वर्ष में दीपावली,कोजागरी को भी लक्ष्मी पूजा होती है।परंतु महालक्ष्मी पूजा सिर्फ पितृ पक्ष में श्राद्ध और पूजन साथ करते हैं? इसका रहस्य खोजते हैं? आप अपने विचार प्रकट कर सकते हैं।
श्रीमती आशा ठाकुर का उत्तर - पितृ पक्ष और महालक्ष्मी पूजन का अर्थ और महत्व कुछ इस तरह है।
जैसे की पृत पक्ष एक पारंपरिक हिन्दूओं के श्रद्धा से जुड़ी ( पूर्वजों ) की आत्मा की शांति और तृप्ति के लिए किया जाता है।
इस दौरान , लोग अपने पितरों की आत्मा शांति के लिए तर्पण , श्राद्ध करते है।
पितृ पक्ष का उद्देश्य होता है। अपने पितरों की आत्मा को तृप्ति करना और मोक्ष की प्राप्ति दिलाने में मददत करना होता है।
महालक्ष्मी पूजन : -
महालक्ष्मी पूजन देवी की आराधना के लिए की जाती है। इस पूजन का यह अर्थ है। की महालक्ष्मी पूजन से सुख , समृद्धि , धन की प्राप्ति होती है। इस उद्देश्य से इसकी पूजा की जाती है।
अब प्रश्न यह है। की महालक्ष्मी की पूजा एवं पितृ पक्ष दोनों साथ साथ क्यों
मनायी जाती है।
यह मानना है। की पितरों की आत्म शांति एवं तृप्ती के लिए की जाने वाली पूजन में देवी लक्ष्मी की कृपा की आवश्यकता होती है।
गज लक्ष्मी महालक्ष्मी क्यों नहीं होगी ?
गज लक्ष्मी और महालक्ष्मी दोनों देवी लक्ष्मी जी का स्वरूप है। लेकिन उनके अर्थ और महत्व में अंतर है। गज वाहिनी लक्ष्मी देवी लक्ष्मी की एक विशिष्ट रूप को दर्शाता है। जिसमें वह हाथी पर सवार होती है।
महालक्ष्मी पूजन में देवी लक्ष्मी जी को उनकी समृद्धि , और धन की शक्ति के रूप पूजा जाता है। जो पितरों की आत्मा की शांति और परिवार की सुख , समृद्धि के लिए आवश्यक है।
देवी लक्ष्मी की कृपा की महत्व पूर्ण भूमिका होती है।
*कल आपने विस्तार पूर्वक जानकारी देते हुए यमराज के 3वर का रहस्य भेदन किया*
*गहरे ज्ञान के समुद्र में जो गोते लगाता है, मोती भी तो उन्हें ही मिलता है*
*हिंदू दर्शन में त्रिमूर्ति और त्रिगुण का सिद्धांत है,सब कुछ तीन के चक्र पर चलने वाला*
*तीन गुण*
*सत रज तम*
*तीन अवस्थाएं*
*जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति*
*त्रिकाल*
*भूत भविष्य वर्तमान*
*अंक तीन को हिंदू धर्म और ब्रम्हांड का प्रतीक माना गया है*
*सृष्टि पालन और संहार*
*त्रिमूर्ति*
*ब्रम्हा विष्णु महेश*
*तीन वरदान*
*धर्म अर्थ काम*
*शरीर मन आत्मा*
*साधक के जीवन को पूर्णता और मुक्ति प्रदान करना है*
*संक्षेप में*
*तीन का अंक*
*शुरुआत निरंतरता और अंत का प्रतिनिधित्व कर, किसी भी वरदान की संपूर्णता को दर्शाता है*
श्रीमती सपना ठाकुर - रहस्य का ज्ञान तो मुझे नहीं है, परंतु ये दोनों पितृ तर्पण और महालक्ष्मी पूजन विधि द्वापरयुग के महाभारत काल खण्ड में ही अलग-अलग समय प्रारंभ हुए हैं युद्ध से पहले महालक्ष्मी पूजन माता कुंती और महारानी गांधारी ने किया तथा कर्ण कि कथा से आप सभी परिचित ही है,युद्ध के पश्चात् कर्ण कि मृत्यु हो गयी थी जब वे स्वर्ग में पहुंचे तो उनको भोजन में स्वर्ण ही दिया जाता था क्योंकि जो वस्तु आप धरती पर धर्म युक्त हो कर दान करते हैं वहीं मृत्यु के बाद पर लोक में मिलता है महालक्ष्मी पूजन् में भी तर्पण शब्द आता है जब महर्षि व्यास जी ताजी दूर्वा से लक्ष्मी जी को जल का तर्पण देने को कहते हैं, इससे समझा जा सकता है कि, अश्विन मास तर्पण हेतु श्रेष्ठ है, जिसमें देवता तथा पितृ दोनों को ही तर्पण देकर संतुष्ट तथा प्रसन्न किया जाता है, दानवीर कर्ण को स्वर्ग में भूखा रहना पड़ता था तब भगवान् ने उन्हें धरती पर जानकर पितरों के निमित्त तर्पण देकर अन्न जल दान करने को कहकर धरती पर भेज दिया जो 16 दिन दानवीर कर्ण धरती पर रहने आए वह अश्विन मास का था जिसे हम सब आज पितृ पक्ष कहते हैं , पितृ तर्पण और श्राद्ध दान का प्रारंभ किया,जो आज हम सब के लिए एक पवित्र पर्व है, अपने अपनों को हृदय से स्मरण करने का महालक्ष्मी पूजन परंपरा पहले शुरू हुई बाद में पितृ तर्पण पता नहीं मेरे विचार कितने सही है या नहीं ये आप सभी बड़े मुझे समझाइएगा
मेरा व्यक्तिगत विचार पितृपक्ष में महिलाओ को भी अपने पूर्वजो को जल अवश्य ही देना चाहिए जल सम्मान है हमारे सनातन धर्म में पूरूषो को तर्पण करने का विधान है पूरूषो से वंशावली चलती है खानदान की पहचान पूरूषो के नाम पर आधारित है बहुत गर्व की बात है मेरा विषय है महिलाओ पर एक बिटिया का सबसे अधिक लगाब पिता से होता है काम से आते ही ही पापा की परी बेटी पानी चाय अवश्य देती है पापा कैसी तबीयत है थके थके लग रहे हो सुनकर पिता प्रफूलित होते दिल से आशीष देते है विवाह के बाद भी मायके में भाई भाभी आपके सम्मान में कमी नही करते पर बहनो आप भी अपने शक्तिनुसार अपने माता पिता जो अब नही है उनके निमित्त पितृपक्ष में एक लौटा जल में जरा सी मिस्री मिलकर दक्षिण में माता पिता को याद करते है जल दीजिए उनकी तिथि में यथाशीघ्र दान भोजन अवश्य करावे ऐ ना सोचे मायके में भैया तो कर रहे है आपका भी फर्ज है माता पिता आपको पढाये लिखाने विवाह किये तो आप भी कुछ उनके निमित्त करे बहुत आशीर्वाद मिलेगा मेरा व्यक्तिगत अनुभव है
श्रीमती सलीला ठाकुर - सभी पितृगणो को सादर नमन पितृपक्ष को बहुत श्रृद्धा सम्मान और सावधानी से मनाना चाहिए।इस पखवाड़े में हमारे पूर्वज अपने परिवार के सदस्यो को देखने आते है अतः हम सभी को पितृगणो का भरपूर सम्मान करना चाहिए उनके पंसद के व्यंजन बनाये मातृपितृ स्वरूप बुजुर्गो को भोजन कराये .विशेष ध्यान रखे इस पखवाड़े गीता का 7 वा अध्ययन और 18 वा अध्ययन अवश्य पढे नया कार्य प्रारंभ ना करे लकड़ी के समान फर्नीचर बिल्कुल ना खरीदे लकडी का संबंध सीधे शैय्या दान से होता है रात में एक बाती का दीया पितृरो के नाम से रखे रसोई में दीया की लौ दक्षिण दिशा में हो एक लौटा जल भी दीया के साथ रखे सुबह जल पौधौ में डाल दे पितृपक्ष में रोज करे पितृगण का विशेष आशीर्वाद मिलेगा
मेरा व्यक्तिगत विचार पितृपक्ष में महिलाओ को भी अपने पूर्वजो को जल अवश्य ही देना चाहिए जल सम्मान है हमारे सनातन धर्म में पूरूषो को तर्पण करने का विधान है पूरूषो से वंशावली चलती है खानदान की पहचान पूरूषो के नाम पर आधारित है बहुत गर्व की बात है मेरा विषय है महिलाओ पर एक बिटिया का सबसे अधिक लगाब पिता से होता है काम से आते ही ही पापा की परी बेटी पानी चाय अवश्य देती है पापा कैसी तबीयत है थके थके लग रहे हो सुनकर पिता प्रफूलित होते दिल से आशीष देते है विवाह के बाद भी मायके में भाई भाभी आपके सम्मान में कमी नही करते पर बहनो आप भी अपने शक्तिनुसार अपने माता पिता जो अब नही है उनके निमित्त पितृपक्ष में एक लौटा जल में जरा सी मिस्री मिलकर दक्षिण में माता पिता को याद करते है जल दीजिए उनकी तिथि में यथाशीघ्र दान भोजन अवश्य करावे ऐ ना सोचे मायके में भैया तो कर रहे है आपका भी फर्ज है माता पिता आपको पढाये लिखाने विवाह किये तो आप भी कुछ उनके निमित्त करे बहुत आशीर्वाद मिलेगा मेरा व्यक्तिगत अनुभव है
मेरा व्यक्तिगत विचार पितृपक्ष में महिलाओ को भी अपने पूर्वजो को जल अवश्य ही देना चाहिए जल सम्मान है हमारे सनातन धर्म में पूरूषो को तर्पण करने का विधान है पूरूषो से वंशावली चलती है खानदान की पहचान पूरूषो के नाम पर आधारित है बहुत गर्व की बात है मेरा विषय है महिलाओ पर एक बिटिया का सबसे अधिक लगाब पिता से होता है काम से आते ही ही पापा की परी बेटी पानी चाय अवश्य देती है पापा कैसी तबीयत है थके थके लग रहे हो सुनकर पिता प्रफूलित होते दिल से आशीष देते है विवाह के बाद भी मायके में भाई भाभी आपके सम्मान में कमी नही करते पर बहनो आप भी अपने शक्तिनुसार अपने माता पिता जो अब नही है उनके निमित्त पितृपक्ष में एक लौटा जल में जरा सी मिस्री मिलकर दक्षिण में माता पिता को याद करते है जल दीजिए उनकी तिथि में यथाशीघ्र दान भोजन अवश्य करावे ऐ ना सोचे मायके में भैया तो कर रहे है आपका भी फर्ज है माता पिता आपको पढाये लिखाने विवाह किये तो आप भी कुछ उनके निमित्त करे बहुत आशीर्वाद मिलेगा मेरा व्यक्तिगत अनुभव है
मेरा व्यक्तिगत विचार पितृपक्ष में महिलाओ को भी अपने पूर्वजो को जल अवश्य ही देना चाहिए जल सम्मान है हमारे सनातन धर्म में पूरूषो को तर्पण करने का विधान है पूरूषो से वंशावली चलती है खानदान की पहचान पूरूषो के नाम पर आधारित है बहुत गर्व की बात है मेरा विषय है महिलाओ पर एक बिटिया का सबसे अधिक लगाब पिता से होता है काम से आते ही ही पापा की परी बेटी पानी चाय अवश्य देती है पापा कैसी तबीयत है थके थके लग रहे हो सुनकर पिता प्रफूलित होते दिल से आशीष देते है विवाह के बाद भी मायके में भाई भाभी आपके सम्मान में कमी नही करते पर बहनो आप भी अपने शक्तिनुसार अपने माता पिता जो अब नही है उनके निमित्त पितृपक्ष में एक लौटा जल में जरा सी मिस्री मिलकर दक्षिण में माता पिता को याद करते है जल दीजिए उनकी तिथि में यथाशीघ्र दान भोजन अवश्य करावे ऐ ना सोचे मायके में भैया तो कर रहे है आपका भी फर्ज है माता पिता आपको पढाये लिखाने विवाह किये तो आप भी कुछ उनके निमित्त करे बहुत आशीर्वाद मिलेगा मेरा व्यक्तिगत अनुभव है
महर्षि वेद व्यास जी द्वारा महालक्ष्मी व्रत की कथा सुनाई गई।१६दिन १६गांठ वाले डोरे की विस्तृत कथा आप सभी जानती हैं 🙏
गांधारी के सौ पुत्रों द्वारा विशाल हाथी मिट्टी का बनाया गया, जिस पर महालक्ष्मी
गजलक्ष्मी रुप में स्थापित कर गांधारी ने पूजन किया पर इस पूजा में कुंती को निमंत्रण नहीं था ।
फलस्वरूप उन्हें उदास देखकर अर्जुन ने स्वर्ग से इंद्र ,(पिता)देवता का ऐरावत हाथी बुलाया ।
उसपर महालक्ष्मी के गजस्वरूप की भव्य पूजा की गई।
कर्ण द्वारा पित्र पक्ष का आरंभ सपना बहन ने बताया है दोनों तर्पण एवं पूजन सम्मिलित रुप से महालया पर्व पक्ष कहलाते हैं
श्रीमती वंदना ठाकुर -
बहनो मैं आज एक ऐसे विषय मैं चर्चा करने जा रहैं जिसमें दिन और तिथि एक ही है पर कथा दो हैं
जनवितरण व्रत---
पहली कथा है जिसका संबंध श्रीकृष्ण और अभिमन्यू की पत्नी उत्तरा से हैं द्वापर युग मैं अश्वत्थामा के बाण के प्रभाव से उत्तरा का पुत्री गर्भ मैं ही मृत्यु हो गई थी जिसे श्रीकृष्ण नें अपने पुण्य फल और योग साधना से पुनर्जीवित कीया और उत्तरा के उस पूत्र का नाम जिवितपूत्रिका रखा तभी से महीलाऐ अपनी संतान की रक्षा के लिए इस व्रत को करती हैं।
तथा इसमें संबंधित दूसरी कथा जो हम सभी जानते व पढते है वह चील और सियारिन की इसमें चील और सियारिन कुछ महीलाओं को व्रत और पूजा करते देखती हैं और दौनो इस व्रत को करने की कामना करती हैं सियारिन भूखे रहने के कारण मरे हुए पशु का मांस खालेती हैं और चील पूरे समर्पण से इस व्रत को करती हैंइस व्रत के फल सें चील के बच्चे पूर्ण स्वस्थ और सुखी रहते है और सियारिन के बच्चे मरते जाते हैं तब सियारिन ने इसका कारण पूछा तब जिवित ब्राम्हण ने जिन्हे यह कथा स्वयं श्रीकृष्ण ने बताई थी को सियारिन को बताया और चील ने पिछले जन्म की कहानी बताई तब सियारिन भी इस व्रत के महत्व कोने और सून कर इस व्रत को किया जिससे उसके भी बच्चे जिवित रहने लगे इस कारण ही महीलाऐ आज भी बच्चो की सुखी जिवन के लिए इस व्रत को करती हैं
कछ महीलाऐ इस व्रत के साथ महालक्ष्मी का जिसमें गज। लक्ष्मी भी कहते है का व्रत भीतरी हैजिससे धर मैंबच्चो की खुश हाली के साथ साथ सुख समृद्धी भी आती हैं हम आज इन्ही परपंरा का पालन करते आ रहैं हैं अब इसमे जो भी गलती हो उसके लिए
मेरा व्यक्तिगत विचार पितृपक्ष में महिलाओ को भी अपने पूर्वजो को जल अवश्य ही देना चाहिए जल सम्मान है हमारे सनातन धर्म में पूरूषो को तर्पण करने का विधान है पूरूषो से वंशावली चलती है खानदान की पहचान पूरूषो के नाम पर आधारित है बहुत गर्व की बात है मेरा विषय है महिलाओ पर एक बिटिया का सबसे अधिक लगाब पिता से होता है काम से आते ही ही पापा की परी बेटी पानी चाय अवश्य देती है पापा कैसी तबीयत है थके थके लग रहे हो सुनकर पिता प्रफूलित होते दिल से आशीष देते है विवाह के बाद भी मायके में भाई भाभी आपके सम्मान में कमी नही करते पर बहनो आप भी अपने शक्तिनुसार अपने माता पिता जो अब नही है उनके निमित्त पितृपक्ष में एक लौटा जल में जरा सी मिस्री मिलकर दक्षिण में माता पिता को याद करते है जल दीजिए उनकी तिथि में यथाशीघ्र दान भोजन अवश्य करावे ऐ ना सोचे मायके में भैया तो कर रहे है आपका भी फर्ज है माता पिता आपको पढाये लिखाने विवाह किये तो आप भी कुछ उनके निमित्त करे बहुत आशीर्वाद मिलेगा मेरा व्यक्तिगत अनुभव हैबहनो मैं आज एक ऐसे विषय मैं चर्चा करने जा रहैं जिसमें दिन और तिथि एक ही है पर कथा दो हैं
जनवितरण व्रत---
पहली कथा है जिसका संबंध श्रीकृष्ण और अभिमन्यू की पत्नी उत्तरा से हैं द्वापर युग मैं अश्वत्थामा के बाण के प्रभाव से उत्तरा का पुत्री गर्भ मैं ही मृत्यु हो गई थी जिसे श्रीकृष्ण नें अपने पुण्य फल और योग साधना से पुनर्जीवित कीया और उत्तरा के उस पूत्र का नाम जिवितपूत्रिका रखा तभी से महीलाऐ अपनी संतान की रक्षा के लिए इस व्रत को करती हैं।
तथा इसमें संबंधित दूसरी कथा जो हम सभी जानते व पढते है वह चील और सियारिन की इसमें चील और सियारिन कुछ महीलाओं को व्रत और पूजा करते देखती हैं और दौनो इस व्रत को करने की कामना करती हैं सियारिन भूखे रहने के कारण मरे हुए पशु का मांस खालेती हैं और चील पूरे समर्पण से इस व्रत को करती हैंइस व्रत के फल सें चील के बच्चे पूर्ण स्वस्थ और सुखी रहते है और सियारिन के बच्चे मरते जाते हैं तब सियारिन ने इसका कारण पूछा तब जिवित ब्राम्हण ने जिन्हे यह कथा स्वयं श्रीकृष्ण ने बताई थी को सियारिन को बताया और चील ने पिछले जन्म की कहानी बताई तब सियारिन भी इस व्रत के महत्व कोने और सून कर इस व्रत को किया जिससे उसके भी बच्चे जिवित रहने लगे इस कारण ही महीलाऐ आज भी बच्चो की सुखी जिवन के लिए इस व्रत को करती हैं
कछ महीलाऐ इस व्रत के साथ महालक्ष्मी का जिसमें गज। लक्ष्मी भी कहते है का व्रत भीतरी हैजिससे धर मैंबच्चो की खुश हाली के साथ साथ सुख समृद्धी भी आती हैं हम आज इन्ही परपंरा का पालन करते आ रहैं हैं अब इसमे जो भी गलती हो उसके लिए
श्रीमती सलीला ठाकुर -
सादर प्रणाम पितृपक्ष में सनातन धर्म को मानने वाला सभी बहुत ही खुशी से श्रृद्धा इस पखवाड़े को मनाते है खून का रिश्ता बहुत मजबूत होता है संसार में कितने भी रिश्ते बना ले पर समय आने पर वही रिश्ता काम आता है जिसमें वैचारिक मतभेद और अटूट प्रेम संबंध हो मातापिता सास ससुर भाई बहन ससुराल पक्ष के करीबी ही खून का रिश्ता है इसलिए पितृपक्ष में दिल से यथासंभव कर्तव्य निभाते है सिर्फ एक बात बोल रही हूं अन्यथा ना ले कुछ लोग जीते-जी बुजुर्गो का बिल्कुल ख्याल नही करते पर उनके जाने के बाद इतना दिखाबा करते है समाज में सम्मान पाने के लिये ऐसै लोगो का वर्तमान तो अच्छा हो सकता है पर भविष्य नही आज कल गुगल यूट्यूब देखकर बहुत ज्ञान की बाते करते है जो घर में बुजुर्ग बैठे है तमाम जीवन का अनुभव है सिर्फ उनकी बात सुनकर अनुसरण करे उनका आशीर्वाद इतना मिलेगा जिसकी आप कल्पना भी नही कर सकते गुगल यूट्यूब पूरे विश्व की बात बतायेगा पर हमारे बुजुर्ग अपने समाज परिवार रिश्तो के व्यक्तिगत अनुभव का पाठ कराते है मेरे जीवन की पाठ शाला में बुजुर्गो का अनुभव बहुत महत्वपूर्ण होता है मेरी बात से किसी को तकलीफ हो तो क्षमा करे
सागरिका मैथिल ब्राम्हण महिला सभा मंच की विधिवत सभी विधाओं का १-१०-२०२० से संचालन करने जा रहे हैं।
१ और२तारीख को सुबह योग और एक्यूप्रेशर, ध्यान का समय रहेगा
विधा संचालिका सुश्री मालिका झा जी होंगी जिनसे हम इन विधाओं की बारीकियां जानेंगे आपके कोई सवाल हों तो आप लोग उनसे पूछ सकते हैं उनके नंबर पर
१०बजके के बाद साहित्यिक विधा की शुरुवात होगी
जिसका विषय होगा- वर्तमान परिवेश में मैथिल ब्राम्हण रीति- रिवाजों का महत्व और जीवन मे उपयोगिता
जिनके निम्न बिंदु होंगे
१- व्रतों का धार्मिक, सामाजिक व स्वास्थ्य पर प्रभाव
२- विज्ञान और धर्म एक दूसरे के पूरक
३- धर्म और रूढ़ि में आप क्या अंतर देखती हैं
४- क्या बदलाव जरूरी है
जिसमें आपसभी लोग गद्य अथवा पद्य किसी भी विधा में अपनी रचनाएं प्रेषित कर सकते हैं।
ओडियो, वीडियो भेजिए या टाइप करके भेज सकते हैं अपनी सुविधा के अनुसार।
यह कोई प्रतियोगिता नहीं है सिर्फ अपने विचारों का आदान प्रदान है।
इस कार्यक्रम की संचालिका श्रीमती अनिता शरद झा जी तथा समीक्षक होंगी श्रीमती अन्नपूर्णा ठाकुर जी तथा श्रीमती अनसुइया झा जी
तो उक्त विषय पर आप सभी अपने विचार भेजिए ऑडियो, वीडियो के माध्यम से या टाइप करके।
कार्यक्रम के समय कार्यक्रम से सम्बंधित ही पोस्ट करें और सबके साथ कार्यक्रम का आनन्द उठाएं
धन्यवाद
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